“बीस साल हिमाचल प्रदेश में सरकारी बस चलाई है मैंने”, पहाड़ी सड़कों पर बड़ी सफ़ाई से अपनी स्विफ्ट डिजायर गाड़ी चलाते हुए गिरवर सिंह जी बोले, “अब बस यहाँ कसौली में ही टैक्सी चलाता हूँ अब। यहीं घर भी है मेरा।”
क़रीब पैंसठ साल की उनकी उम्र रही होगी। दाढ़ी बढ़ा रखी थी। उम्र की भेंट की गई अनगिनत लकीरें उनके माथे पर बिखरी हुई थी। चेहरे पर एक पहाड़ी आनंद और असीम शांति की अनुभूति छुपाये नहीं छुप रही थी।
“यहाँ कहीं कोई खाने की अच्छी जगह है क्या?”, मैंने पूछा। गिरवर सिंह जी मुस्कुराते हुए बोले, “देखिए साब, एक दुकान है तो। और बहुत लोग देश-विदेश से उस दुकान के समोसा-बन खाने भी आते हैं। लेकिन बन तो बन ही है, और समोसा भी समोसा ही है। उनमें तो कोई ख़ास बात है नहीं। लेकिन अब अगर लोगों को वो खा कर ख़ास लगता है, तो ठीक है। आप भी खा सकते हैं। मैं आपको वहाँ पर छोड़ दूँगा”।
“अगर ख़ास नहीं है समोसा-बन, तो लोगों को ख़ास लगता क्यों है?”, मैंने पूछा।
गिरवर सिंह जी बोले, “जब इतने लोग उसे अच्छा बोल चुके हैं। दुकान का इतना नाम हो गया है। आख़िर दूर-दूर से इतनी उम्मीदें ले कर लोग उसे खाने आते हैं। ऐसे में देखा जाए तो स्वाद से ज़्यादा लोग एक अनुभव ही तो जी रहे होते हैं। उस अनुभव के पूरे होने की ख़ुशी तो होती ही है। अब वो ख़ुशी समोसा-बन खा कर आयी, या अनुभव पूरा होने से, ये कैसे पता चले? तो लोग यही समझ लेते हैं कि ख़ुशी समोसा-बन से ही आयी होगी।”
उनका यह विश्लेषण मेरी समझ को नये आयाम दे रहा था। मैं गाड़ी से बाहर देखता हुआ उनके शब्दों पर विचार करने लगा। गाड़ी घुमावदार रास्तों पर मनकी पॉइंट से चर्च चौराहे की तरफ़ फिसलते हुए जा रही थी। पूरे रास्ते पर्यटक ही पर्यटक थे। टैक्सी में भी, और पैदल भी। अधिकतर सैलानी युवा ही थे जो करीबी राज्यों, पंजाब, दिल्ली, या हरियाणा, से आये हुए थे।
गाड़ी में चुप्पी छायी रही। मेरे आँखों के सामने दृश्य बदल रहे थे, और दिमाग़ में विश्लेषण चल रहा था।
“पता नहीं क्यों लोग इतना पैसा खर्च कर यहाँ वहाँ घूमने आते हैं। घर में शांति है। वहाँ क्यों नहीं बैठते चैन से।” गिरवर सिंह जी अचानक से बोले, “दूर किन्हीं नये दृश्यों और नये अनुभवों के बीच ख़ुद को भुला देने की चाह। लेकिन कहाँ सफल हो पाते हैं। कितने भी सुंदर दृश्य हों, दृश्य पटल पर कुछ समय पश्चात पुराने हो कर धूमिल हो ही जाते हैं। मन में ऐसे समा जाते हैं कि फिर दिखायी भी नहीं देते। सुंदर तो वो अभी भी हैं। लेकिन नवीनता चली जाती है।”
“मन नये के पीछे भागता है। वो एक आशा लेकर आता है, क्योंकि उस में संभावना होती है। उसके मनचाहा दे जाने की संभावना। लेकिन साब, नया भी तो पुराना हो ही जाता है। आख़िर अपना नयापन और आकर्षण खो बैठता है। और मन – नये अनुभवों की तलाश में भागता ही रहेगा। लेकिन इस भागने में थकान है। मन की थकान भी है और शरीर की भी।”
“किस से भागता है मन। क्यों भागता है? क्या पकड़ना चाहता है? क्या वो, जिसे पकड़ के ठहर जाए? जिस से भागना रुक जाये? किस से छुपना चाहता है? ख़ुद से? लेकिन साब, असली समझ इस बात को जानने में है कि कब तक और कहाँ भागें की अख़िरकार भागना रुक जाये। और अटूट शांति-सुख पा जायें। लेकिन वो समझ कैसे आएगी? ख़ुद का सामना करने की हिम्मत कैसे आएगी?”
गिरवर सिंह जी यह बड़ा प्रश्न खड़ा कर रियर व्यू मिरर में मुझे देखने लगे कि मैं उनकी इतनी बातें सुनकर अभी भी टैक्सी में ना सिर्फ़ जमा हुआ हूँ, बल्कि उत्सुकता से सुन भी रहा हूँ।
“हम सभी जीवन के उत्तर ही तो ढूँढ रहे हैं साब। उसे ढूँढने में हम जीवन भर बाहर भटकते हुए बिता देते हैं। जब जीवन का उद्देश्य ही बाहर से अंदर जाना है, तब बाहर सब ढूँढ भी क्या रहे हैं? बाहर मन बहलता है लेकिन उत्तर कहाँ मिलते हैं। जब मन नहीं बहलता, तब वो यहाँ-वहाँ भागने लगता है। कहीं दूर जाने की बात करता है। उड़ जाना चाहता है। लेकिन कहाँ? कहीं भी, लेकिन यहाँ से दूर। बस यहाँ का पता ना चले। यहाँ की कोई महक या निशानी भी ना दिखे। ख़ुद का पता भी ख़ुद को ना चले, इतना दूर।”
“शांति की ही तो तलाश है हर किसी को। उसी से तो सुख उपजता है। उसे ही ढूँढने ये सब दर-दर भटकते हैं। सारे संत महात्मा कह गये हैं कि बाहर सुख नहीं है। सुख तो अंदर है। उसे बाहर ढूँढने आई ज़रूरत ही क्यों है? कबीर दास जी कह तो गये, “मुझ को कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।” इतना आसान समझाया है कबीर दास जी ने, लेकिन लोग ना तो सुनना चाहते हैं और ना ही समझना।”
गिरवर सिंह जी अब ख़ुद से ही बात करने लगे थे। शायद ये द्वन्द उनके जीवन का भी रहा है। ये लड़ाइयाँ उनकी भी रही हैं। “साहब, बाहर लड़ी जाने वाली लड़ाइयाँ और संघर्ष तो सभी को दिखते हैं, लेकिन अंदर के संघर्ष किसी को नहीं दिखते। वो लड़ाई हमारी-आपकी निजी होती है। वहाँ कोई हथियार नहीं दिखते, किसी को बाहरी ज़ख़्म नहीं लगते।”
“बाहर से देखें तो कहीं कोई विरोधाभास नहीं दिखाई देता। लेकिन लड़ाई सभी के अंदर चल रही है। ख़ुद की इच्छाओं और समाज के बनाये माप-दंडों के बीच की लड़ाई, नये अनुभव पाने के लिए अपने सुरक्षित परिचित परिवेश को ना छोड़ पाने की मजबूरी, कुछ बड़ा पाने की इच्छा लेकिन उसे पाने के लिए कुछ खोने के डर की आशंका, और कहीं ख़ुद के अंदर के दर्द का सामना कर पाने के लिए हिम्मत ना जुटा पाने की लड़ाई।”
“कुछ ही इस अंतर्द्वंद का सामना करने की हिम्मत जुटा पाते हैं। बाक़ी या तो जीवन भर युद्ध क्षेत्र का सामना करने से डरते रहते हैं, और कुंठा में ही अधूरा जीवन काट लेते हैं। कुछ विजय पा लेते हैं, और महावीर कहलाते हैं, और अनंत आनंद में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।”
गिरवर सिंह मेरी प्रतिक्रिया के लिए भी नहीं रुक रहे थे। उनका मंथन चल रहा था। उनके मंथन का हर शब्द मेरी सांसारिक समझ को भी झझकोर रहा था। आख़िर मैं भी तो बाहर शांति, नये अनुभवों की तलाश, और अपने हिस्से की चंद ख़ुशी के लम्हे ही तो चुनने आया था। ऐसा लग रहा था कि गिरवर सिंह मुझे ही समझा रहे थे। कसौली से सोलन का रास्ता मेरा कुरुक्षेत्र बन गया था, और गिरवर सिंह जी मेरे कृष्ण और मैं उनका अर्जुन।
गीता बहने लगी थी।
भारत में गहरे अध्यात्म को सुनने और पाने के लिए कहीं किसी विशेष व्यक्ति या जगह को चुनने या जाने की ज़रूरत नहीं होती। कण कण में बिखरा पड़ा है अध्यात्म यहाँ। बस उसे सारस सा मोती की तरह चुनने वाले कुछ विरले ही होते हैं। कभी टैक्सी वाला, ऑटो वाला, दुकान वाला, बस-रेलगाड़ी का सहयात्री, या चाय वाला – कोई भी हो सकता है जो जीवन के प्रति आपके दृष्टिकोण को बदल सकता है। बस उनके अंदर के तार तो छूना भर होता है, चारों तरफ़ मधुर संगीत बिखर जाता है, और आप उस में नहा लेते हैं।
“लीजिए, आ गई आपकी समोसा-बन की दुकान”, गिरवर सिंह जी की आवाज़ ने अचानक से मेरे विचारों की श्रृंखला तोड़ी, “गाड़ी यहीं तक ही जा पाएगी। किसी से भी तन्नु की दुकान पूछेंगे तो बता देगा। बस थोड़ा चलेंगे और दुकान आ जाएगी।”
