मई 2026 भारत की परीक्षा-प्रणाली के लिए शर्मिंदगी का महीना बनकर रह गया। एक ही महीने में देश की तीन सबसे बड़ी परीक्षाएं, नीट, सीबीएसई और सीयूईटी, लड़खड़ा गईं, और उनके साथ लड़खड़ा गया लाखों छात्रों का वह भरोसा जिस पर इस व्यवस्था की वैधता टिकी है। परीक्षा और उसके मूल्यांकन की प्रक्रिया ईमानदार और निष्पक्ष है – इसी विश्वास पर यह तंत्र खड़ा होता है। लेकिन, इस मई की बढ़ी गर्मी में वह विश्वास पूरी तरह चटक गया।
पहली चोट नीट पर पड़ी। 3 मई को करीब 23 लाख छात्रों ने यह परीक्षा दी। ठीक नौ दिन बाद, 12 मई को, इसे पूरी तरह रद्द कर दिया गया। जांच में सामने आया कि परीक्षा से कुछ दिन पहले ही एक ‘गेस पेपर’ घूम रहा था जिसमें 410 सवाल थे, और करीब 120 असली पर्चे में ऐसे-के-ऐसे निकल गए। यही पर्चा परीक्षा से पहले 30 हज़ार से लेकर 28 लाख रुपये तक में बिक रहा था। सबसे शर्मनाक बात यह थी कि गिरफ्तार होने वालों में एनटीए से जुड़े कुछ लोग शामिल थे। हालात इतने बिगड़े कि खुद शिक्षा मंत्री को मानना पड़ा कि व्यवस्था की ‘कमांड चेन’ में सेंध लगी है, और मामला सीबीआई से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। प्रधान-मंत्री ने खुद स्थिति का मुआयना करने की बात कही है, और यहाँ तक कि सरकार वायु-सेना की मदद लेने पर भी विचार कर रही है।
दूसरी चोट सीबीएसई से आई। 13 मई को घोषित नतीजों के बाद बोर्ड कठघरे में खड़ा हो गया। पहली बार करीब 18 लाख छात्रों की उत्तर-पुस्तिकाओं का डिजिटल मूल्यांकन (ऑन-स्क्रीन मार्किंग) कराया गया था। चार लाख से ज़्यादा छात्रों ने स्कैन प्रति मांगी, और 11 लाख से ज़्यादा बार उत्तर-पुस्तिकाएं देखने के लिए आवेदन आए। कई छात्रों को धुंधले या गायब पन्नों वाली कॉपियां मिलीं, तो किसी को किसी और की उत्तर-पुस्तिका थमा दी गई। जब इतनी बड़ी संख्या में परीक्षार्थी बोर्ड के मूल्यांकन पर शंका करने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था की नींव चरमराने लगी है।
और जैसे यह काफी नहीं था। 30 मई को सीयूईटी की बारी आई। तकनीकी गड़बड़ी के चलते भीषण गर्मी में छात्र और अभिभावक तीन-तीन, चार-चार घंटे बेसहारा इंतज़ार करते रहे, वो भी बिना किसी साफ सूचना के। इस परीक्षा को भी करीब 15 लाख छात्र देते हैं।
समस्या यह है कि ये अलग-अलग, इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं। नीट 2024 में भी पेपर लीक के चलते रद्द हो चुकी है, और उससे पहले के वर्षों में भी अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। विडंबना यह है कि परीक्षाओं में पारदर्शिता लाने के लिए ही 2017 में एनटीए बनाई गई थी, और उसके बावजूद बार-बार यही एजेंसी आरोपों के घेरे में है। यह चूक नहीं बल्कि तंत्र की असफलता है।
छात्रों और परिवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव
इन परीक्षाओं के रद्द होने या गलत नतीजों के असर को सिर्फ आंकड़ों से नहीं नापा जा सकता। अनेक छात्र इन परीक्षाओं की तैयारी के लिए कर्ज़ लेते हैं, ज़मीन गिरवी रखते हैं, और घर से दूर-दराज़ जाकर तमाम कष्ट सहते हुए पढ़ाई करते हैं। पैसे और परेशानियों से परे, इन परीक्षाओं की वैधता पर लगा प्रश्नचिह्न उस भरोसे को भी हिला देता है कि मेहनत और बलिदान के आगे एक सुनहरा भविष्य है। इस विश्वास का टूटना सबसे खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। यही वजह है कि इस दबाव और उम्मीद टूटने के चलते कुछ छात्रों के आत्महत्या तक करने की दुखद खबरें भी सामने आई हैं।
विदेश में पढ़ाई का सपना
देश की इन दिक्कतों से बचने के लिए जो छात्र समर्थ हैं, वे विदेश जाकर पढ़ने का सपना देखते हैं। लेकिन अब वह सपना भी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। कनाडा ने 2026 में विदेशी छात्रों के परमिट लगभग आधे कर दिए हैं। अमेरिका में इमिग्रेशन के नियम कड़े हो रहे हैं, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने भी आवक पर आंशिक रोक लगाई है, और रूस-यूक्रेन युद्ध ने वहां के रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं।
भारत के लिए चुनौती या अवसर?
विदेशी दरवाज़ों के बंद होने में भारत के लिए चुनौती के साथ एक अवसर भी छिपा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार 2024 में करीब 13 लाख भारतीय छात्र विदेश में पढ़ रहे थे। भारतीय प्रतिभा के विदेश पलायन के नुकसान को रोका जा सकता है। इसलिए, उसके लिए देश में ही विश्व-स्तरीय उच्च-शिक्षा तंत्र खड़ा करने की ज़रूरत अब पहले से कहीं अधिक तात्कालिक है। विडंबना ये है कि एक ओर शिक्षा के अवसर बेहतर करने की ज़रूरत बेहद तीव्र है, और दूसरी ओर वही व्यवस्था ढंग से परीक्षाएं तक कराने में असमर्थ है।
सरकार की 2027 से नीट को कंप्यूटर आधारित करने की घोषणा स्वागत-योग्य है, लेकिन सिर्फ तकनीक से तंत्र नहीं बदलता। भ्रष्टाचार की मानसिकता तकनीक में भी रास्ता निकाल लेती है। असली ज़रूरत है पारदर्शिता के साथ जवाबदेही की, नियमित ऑडिट की, और सीटें बढ़ाने की, ताकि हर सीट जीवन-मरण की लड़ाई न बने, जैसा हमने राजस्थान के कोटा में बढ़ती आत्महत्याओं की विचलित करने वाली खबरों में देखा। जो छात्र देश में रहकर आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी तुरंत अवसर मिलने चाहिए, ताकि प्रतिभा का पलायन रुके।
व्यवस्था में युवाओं का भरोसा दोबारा खड़ा करके ही भारत के ‘विश्व-गुरु’ बनने का सपना साकार होगा। नीट का पेपर लीक, सीबीएसई का विवाद, सीयूईटी की गड़बड़ी, और विदेशों में घटते अवसर, ये एक ही कहानी के चार पन्ने हैं। इस कहानी को भारत के पक्ष में लिखने के लिए उसके सामने एक भारी चुनौती भी है और एक शानदार अवसर भी।
